#My Art.


Back Again

It’s not the end yet,

I am back again!

Soul broken hopes shattered;

No! I am no more that human in vain!

You burried me thinking me ‘No more of use’.

But oh devil-dear, you planted the phenomal woman this way!

Don’t you dare to gaze! My radiance will give you spooky chills and defuse.

You betrayed…oh what a positive start of day.

You were gone in silence and dark; leaving me scared,

But Thanks! I really did not know i will stand out so mighty and brave.

Now the wheel of time will turn the face of you-towards you,

And then ye mark that every fallacy hath your humor.

That every filthy mark a cinaedulus hath, belongs to you too!

And then you’ll remember the teachings of your worthiest parents that you took as ‘zero’ ever, and make regrets and dissolve in it forever!


प्रियतम छवि नैनन बसी तो फिर क्या देस-विदेस…

“जल्द तुझे भी ले जाऊंगा” कह प्रियतम गये परदेस।

गया हर दिन नयी आस में पर मिला न कोई सन्देस,

सोच यही सब सावन बीते कि-

प्रियतम छवि नैनन बसी तो फिर क्या देस-विदेस!
तभी शोक का उमड़ा सागर सा, मन हो विचिलत यूँ हाय!

नहीं लौटे प्रियतम मेरे, अपने भी हुए पराए!

छोड़ गये अब साथ हमारा माता-पिता भी परम लोक समाये।

फिर भी ना लौटे प्रियतम मेरे….अंधकार सा हुआ जग मेरा…

मन रह-रह कर बुलाए-प्रियतम कि बस एक झलक हो तो रौशनी भर जाये!
हुए मुग्ध थे प्रिय यूँ मेरे छाई तन-धन की वासना,

हूईं अनसुनी “उनकी रक्षा करना” कीं सब कामना!

ना जाने कैसे भूल गये अपनी प्रिया को जानना?

भूला दिया सारा जग मैने बस बची थी अब एक आसना-

“प्रियतम छवि नैनन बसी तो फिर क्या देस-विदेस”।

 सात वर्ष तब हुए थे पूरे जब प्रियतम लौटे फिर देस,

अपनी पत्नी संग फिर एक बार इस घर में किया प्रवेश।

शोक-विलय कि अश्रुधार सा निकला सब आशाओं का  झूठा वेश…

ना प्रियतम छवि नैनन बसी स्वदेस भी हुआ परदेस!!


आज वो बेवफा-बेहया अपनों की भावनाओं के साथ खेल खेल रहा था।

अर्धान्गनी को छलकर, परिवार को छोड़कर, शान से एश व आराम गिन रहा था।

अब क्या बताऊँ कितना मूर्ख था वो,

कि अपनी मलिन इच्छाओं और झूठी शान के साये में खुद अपनी बरबादी के दिन बुन रहा था!!


Yesterday i discovered a knife emerging close from my chest.

And so skillfully done by a hand   Whom i knew at my best.

That owner of hand once owned my heart                                             with Unfailing trust and relation so pure.

But i didn’t know that he had intentions so dark                                  To ‘use and throw’ he made his mind for sure.

 The one i wanted wasn’t the one who deserved me                                       His gestures good but intentions so mean.

Ah, i pulled it through…                   And licked that knife clean.

Yet another trophy                                For my dimnishing faith in love and humanity….