APOCALYPSE: The Day Of Reckoning

Author: Sufyan Bin Uzayr

Price: ₹276.50, Pages: 256

From Sufyan Bin Uzayr comes his first work of fiction- ‘The Apocalypse’ and his third book after ‘Sufism: A brief history’ and ‘Concrete5 for Developers’. The book is published by Authorspress.

The story is knit out of unique themes of the eerie side of nature and spritual beliefs in human life. i.e. the end of your world within the end of complete world.

The story perfectly splendors out the factual face of today’s world boosted up with the power of unconditional love of a father for his daughter.

The author has excelled in engrossing the readers till the end of the story by creation of repeated suspense and use of gothic elements.

The climax of the story i.e. Silas- the protagonist of the story discovers that he is still alive after attempting suicide by being defeated from long enduring problems, adds on to the charm of story.

The end of the story is so emotional and true the it will surely leave you spellbound.                                                 If you are the one seeking for the combo of feelings, human emotions and repent with a thrill of facing a completely unmatched side of nature then this book is a must read for you!                                                         The best part is that the book fits well into the ‘suitable-shelf’ for all the categories of ages and especially the youths will find it most fascinating.

The novel imparts a deep understanding of relations and consequences of our works, good or bad. The stylistic devices used with a wide spectrum of good vocabulary appreciates the hard work and deep knowledge of Sufyan Bin Uzayr.

जीवनसाथी

आसमां के शून्य में, रंग भरोगे मेरे साथ?

धरती के मण्डल पे, जीवन लिखोगे मेरे साथ?

वायु कि अभिन्नता सा, प्रतीक बनोगे मेरे साथ?

अग्नि के ताप सा, मेरे मान के रक्षक बन, रहोगे मेरे साथ?

जल की शीतलता और पारदर्शता का सार ले, अविरल लय से बहोगे मेरे साथ?

हर दुखः में भी मेरे स्वामि से पहले मेरे मित्र बनकर आगे बढ़ोगे मेरे साथ?

और इसी तरह सही मायनों में जीवनसाथी बन ज़िन्दगी का स्वाद चखोगे मेरे साथ?


कल फिर सुबह होगी

कल फिर सुबह होगी,

          होगी, या नहीं होगी ये तो सोचना ही व्यर्थ है।

क्योंकी जीवन में कल का क्या अर्थ है?

                               जो कुछ है आज है, अभी है,

सांझ है या रात है ये ही रवि है।

                                   पसीने को तेल बना कर, 

विश्वास के दिये में जलाओगे,

                              तो रात को भी अपने समक्ष,

रवि को ही पाओगे।

तब चुनैतियों और सफलताऐं,                                                              दोनो ही तुम्हारे कदम चूमेंगी,

और इस एक रात में कल जैसी                                                          जाने कितनी सुबह होंगी…                                       जाने कितनी सुबह होंगी!!

फिर से…

चलो फिर से आज जन्नत में जहन्नुम का नज़ारा दिखाते हैं…

चलो फिर से आज प्यार में धोखे का फसाना सुनाते हैं…

वैसे तो लोग उस दर्द भरे किस्से के लफ्ज़ आज भी फिज़ाओं में बहाते हैं…

लेकिन चलिये जाने दीजिये कौन सा हम आपको एक पल में आँसुओं के सैलाब और दुखों के पहाड़ तले दबाना चाहते हैं!!

क्यूँ

कहते हैं जो कुछ होता है उसके पीछे कोई न कोई वजह होती है, 

मगर  सच यह है कि उस वजह के पीछे छिपे हर क्यूँ का जवाब नहीं होता….

जब एक लड़की के साथ जुर्म होता है

तब वजह गिनाने वाले कुछ इस तरह कहते हैं-

“बड़े बाप की बिगड़ी औलाद”

“कपड़े इतने छोटे होंगे तो यही होगा ना”

“इतनी रात को क्या सड़क नापने गई थी बाहर?”

अगर आप इतने बड़े ञानी हैं तो जुर्म करने वाले का भी पथप्रदर्शशन क्यूँ नहीं किया? या फिर कुछ तो टिप्पड़ी करने को ही जीवन का सुख समझते हैं तो याद रखें की आपके साथी कल भी वही होंगे मगर पीड़ित कोई आपका अपना भी हो सकता है! 

याद रखिये कि आपका काम तो टिप्पड़ी कर खत्म हो गया लेकिन उस लड़की का जीवन रही सोचने में निकल जाता है कि क्यूँ आखिर क्यूँ!

खड़े होकर तमाशा देखने वाले बहुत होते हैं। 

कल को जब खुद पे बीते तो ये सोचने में समय व्यर्थ ना करे की कोई मदद करने आगे नहीं आया आखिर क्यूँ!

लड़की को आज भी शाम के सात बजे के बाद बाहर रहने पर रोक लगाना तो ये ना सोचना कि बिटिया कुछ बन क्यूँ नहीं पाई! 

आज-कल छोटी-छोटी बातों पे लोग खासकर (किशोर वर्ग) एक दूसरे कि माताओं-बहनों के लिये अपशब्द बोलते हैं। तो ये भी याद रखें कि आपका आवेश और अगले कि मान हानि कि भरपाई आपके ही कहे अपशब्द आपके अपने के लिये सत्य बनकर बदला न ले लें।

तब ऐसा कहा हि क्यूँ का जवाब नहीं मिलेगा!

और जो लोग कपड़ों को लेकर बड़े जागरूक हैं वो ये भी जानें कि केवल कपड़ों का कुसूर नहीं क्यूँकी हाल ही में शर्म से परे, जुर्म एक छह महीने की बच्ची के साथ हुआ था।
कपड़े कैसे भी हों तन पर सज के उसे परदा करते हैं मगर आपकी नज़र तो आपके चिरित्र का आईना है साहब! कृपया अपना आईना साफ रखियेगा।

# ऊपर लिखे शब्द भावनाओं से जुड़े बेहद संवेदनशील मुद्दों को उठाते हैं किसी भूल-चूक के लिये छमा। समाज के इस नये उभरते चहरे पर कुछ विचार।






लेखक

जादु के लिये जादुगर हाथों का इस्तेमाल किया करते हैं!

दंव्धों के लिये राजा-सेना तलवारों का इस्तेमाल किया करते हैं!

लेकिन हम लेखक तो शब्दों से ही बेमिसाल कमाल किया करते है!!

लम्हा

लम्हा वो नहीं जब तुम हमारे पास आए थे।

लम्हा वो नहीं जब तुमने हम पर पूरी तरह ग़ौर फरमाए थे।

लम्हा वो भी नहीं जब तुमने हमारी तारीफ़ों के गज़ल गाये थे।

लम्हा तो सिर्फ वो था जब आज तुम दिल से मुस्कुराये थे।।