जीवनसाथी

आसमां के शून्य में, रंग भरोगे मेरे साथ?

धरती के मण्डल पे, जीवन लिखोगे मेरे साथ?

वायु कि अभिन्नता सा, प्रतीक बनोगे मेरे साथ?

अग्नि के ताप सा, मेरे मान के रक्षक बन, रहोगे मेरे साथ?

जल की शीतलता और पारदर्शता का सार ले, अविरल लय से बहोगे मेरे साथ?

हर दुखः में भी मेरे स्वामि से पहले मेरे मित्र बनकर आगे बढ़ोगे मेरे साथ?

और इसी तरह सही मायनों में जीवनसाथी बन ज़िन्दगी का स्वाद चखोगे मेरे साथ?


कल फिर सुबह होगी

कल फिर सुबह होगी,

          होगी, या नहीं होगी ये तो सोचना ही व्यर्थ है।

क्योंकी जीवन में कल का क्या अर्थ है?

                               जो कुछ है आज है, अभी है,

सांझ है या रात है ये ही रवि है।

                                   पसीने को तेल बना कर, 

विश्वास के दिये में जलाओगे,

                              तो रात को भी अपने समक्ष,

रवि को ही पाओगे।

तब चुनैतियों और सफलताऐं,                                                              दोनो ही तुम्हारे कदम चूमेंगी,

और इस एक रात में कल जैसी                                                          जाने कितनी सुबह होंगी…                                       जाने कितनी सुबह होंगी!!

फिर से…

चलो फिर से आज जन्नत में जहन्नुम का नज़ारा दिखाते हैं…

चलो फिर से आज प्यार में धोखे का फसाना सुनाते हैं…

वैसे तो लोग उस दर्द भरे किस्से के लफ्ज़ आज भी फिज़ाओं में बहाते हैं…

लेकिन चलिये जाने दीजिये कौन सा हम आपको एक पल में आँसुओं के सैलाब और दुखों के पहाड़ तले दबाना चाहते हैं!!

लेखक

जादु के लिये जादुगर हाथों का इस्तेमाल किया करते हैं!

दंव्धों के लिये राजा-सेना तलवारों का इस्तेमाल किया करते हैं!

लेकिन हम लेखक तो शब्दों से ही बेमिसाल कमाल किया करते है!!

लम्हा

लम्हा वो नहीं जब तुम हमारे पास आए थे।

लम्हा वो नहीं जब तुमने हम पर पूरी तरह ग़ौर फरमाए थे।

लम्हा वो भी नहीं जब तुमने हमारी तारीफ़ों के गज़ल गाये थे।

लम्हा तो सिर्फ वो था जब आज तुम दिल से मुस्कुराये थे।।

वादा

आज की इस तारीख की ख़ासियत का तुझे इल्म भी है?

 आज पूरे हुए उसी पुराने वादे का मन में ज़रा ज़िक्र भी है?

 जिसको सर आँखों पे रख हम हर रोज़ तनहाई को आब की तरह पी गये,

ये बता जान-ए-जिगर मेरे उस प्यार के लिये तेरे दिल में इज्जत की ज़रा सी किश्त भी है?

त्याग

आज फिर से तुम्हारी यादों का दिया जलाया है हमने,

ना जाने कितनी बार इन अश्कों से अपना दामन भिगाया है हमने।

फिर भी हर साल कि तरह इस सालगिरह भी अपना फर्ज़ निभाया है हमने,

पत्नि की तरह तुम्हारे धोखे को भी दुनिया के सामने मजबूरी का नाम दिलाया है हमने।।

 # किसी भूल-चूक के लिये छमा। परिवेश की स्थिति को देखते हुए शब्दों से उकेरे हुए कुछ विचार।☺