इन्सान

तरक्की और तकनीक मेंं,

इस मुकाम पर पहुंचने के बाद भी…

इन्सान की समझ सिर्फ इतनी है कि-

उसे जानवर बोल दो तो बुरा मान जाता है,

और शेर बोल दो तो खुश हो जाता है!

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हद

वो ‘गिरने की हद’ भी शर्मसार हो गई,

जब उसने देखा-

इन्सान को हवस की ऊँचाई पर चढ़़ते हुए,

और उसके ईमान को गहराई में गिरते हुए!

जीवनसाथी

आसमां के शून्य में, रंग भरोगे मेरे साथ?

धरती के मण्डल पे, जीवन लिखोगे मेरे साथ?

वायु कि अभिन्नता सा, प्रतीक बनोगे मेरे साथ?

अग्नि के ताप सा, मेरे मान के रक्षक बन, रहोगे मेरे साथ?

जल की शीतलता और पारदर्शता का सार ले, अविरल लय से बहोगे मेरे साथ?

हर दुखः में भी मेरे स्वामि से पहले मेरे मित्र बनकर आगे बढ़ोगे मेरे साथ?

और इसी तरह सही मायनों में जीवनसाथी बन ज़िन्दगी का स्वाद चखोगे मेरे साथ?


प्रियतम

प्रियतम छवि नैनन बसी तो फिर क्या देस-विदेस…

“जल्द तुझे भी ले जाऊंगा” कह प्रियतम गये परदेस।

गया हर दिन नयी आस में पर मिला न कोई सन्देस,

सोच यही सब सावन बीते कि-

प्रियतम छवि नैनन बसी तो फिर क्या देस-विदेस!

तभी शोक का उमड़ा सागर सा, मन हो विचिलत यूँ हाय!

नहीं लौटे प्रियतम मेरे, अपने भी हुए पराए!

छोड़ गये अब साथ हमारा माता-पिता भी परम लोक समाये।

फिर भी ना लौटे प्रियतम मेरे….अंधकार सा हुआ जग मेरा…

मन रह-रह कर बुलाए-प्रियतम कि बस एक झलक हो तो रौशनी भर जाये!

हुए मुग्ध थे प्रिय यूँ मेरे छाई तन-धन की वासना,

हूईं अनसुनी “उनकी रक्षा करना” कीं सब कामना!

ना जाने कैसे भूल गये अपनी प्रिये को जानना?

भूला दिया सारा जग मैने बस बची थी अब एक आसना-

“प्रियतम छवि नैनन बसी तो फिर क्या देस-विदेस”।

 सात बरस तब हुए थे पूरे जब प्रियतम लौटे फिर देस,

अपनी नई पत्नी संग फिर एक बार इस घर में किया प्रवेश।

शोक-विलय कि अश्रुधार सा निकला सब आशाओं का  झूठा वेश…

ना प्रियतम छवि नैनन बसी स्वदेस भी हुआ परदेस!!