गुरुर

Credit goes to the respective owner. The quote as well as the image, I found on Google, it was so very nice I thought of sharing with you all wonderful poets.🙂🙂

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रूठे रिश्ते

Here is another collaboration with Gourav ji, although the thoughts are mine, but the magic you will feel throughout the poem in its expressions is the skillful work done by Gourav ji.

Hope you all would like it.😊😊

था गुमां मुझे जिन बुलंदियों पे,
झूठे उस ग़ुरूर के सन्मुख,
प्यार भरे रिश्ते, सूली चढ़ गए।
निकल आयी थी मिलों दूर,
बंधन भी सारे, पीछे छूट गए।
मैं चलती रही, अपनी धुन में
और जीवन के इस सफर में,
मुझसे मेरे वो अपने रूठ गए

अनजान अंधकारमय डगर पे,
मेरी नन्ही उंगलियों को थामे,
वो संभलकर चलना सीखा गए।
नादानियों पे आंखें तरेरकर,
वो सबल बन जीना सीखा गए।
मैं डूब गयी जरा चकाचौंध में,
और जीवन के इस सफर में,
मुझसे मेरे वो अपने रूठ गए।

दुखों के जलधि को समेट कर,
मेरी खुशियों को सहेजकर,
त्याग पे त्याग वो करते गए।
मात पिता के आश्रय बल तले
मेरे मैं के थे झूठे पर लग गए!
उड़ती रही मैं, खयाली नभ में,
और जीवन के इस सफर में,
मुझसे मेरे वो अपने रुठ गए।

वो अनकहा प्रेम बाबुल का,
वो सौगात भरा दामन मां का
राहों को मेरे रोशन करते गए।
हठ करती रही मैं तो हमेशा,
पर वो नज़रअंदाज़ करते गए।
भटकी मैं मायावी दुनिया में,
और जीवन के इस सफ़र में,
मुझसे मेरे वो अपने रूठ गए।

अर्थ अनर्थ के समझ से परे,
जिस उन्माद के बंधन तले,
छोड़ आयी थी अपने घरौंदे को।
वो जुनून भी ठुकरा गया मुझे,
एक नई मंजिल तलाशने को।
अब पश्चाताप के गर्त में डूब,
ढूंढूं कहाँ पुराने जज्बातों को?
मनाऊं कैसे मैं अपने रूठों को?

By Nandita and Gouri

दोस्ती

आज के दौर में,

मेरे और मेरे दोस्तों,

की इस दोस्ती को ,

बयां करने के लिये,

ज्यादा शब्द नहीं चाहिए,

बस इतना काफी है कि:-

“मैंने कभी दोस्त नहीं बदले,

मगर मेरे सारे दोस्त बदल गए।”

©PoeticPeriscope

हैरानी

हैरानी तब भी न हुई,

जब बेबुनियाद इल्ज़ामों,

पर सवार होकर,

वो हमसे बहुत दूर चले गए…

हैरानी तो तब हूई…

जब मतलब की स्याही से,

भीगे उनके वो मीठे शब्द,

फिर से हमें मासूमियत

ओढ़कर बुलाने लगे…

दौर

जिस दौर से हम गुज़रे हैं ना,

उस दौर से अगर तुम गुज़रते, तो गुज़र जाते।

इन्सान

तरक्की और तकनीक मेंं,

इस मुकाम पर पहुंचने के बाद भी…

इन्सान की समझ सिर्फ इतनी है कि-

उसे जानवर बोल दो तो बुरा मान जाता है,

और शेर बोल दो तो खुश हो जाता है!

हद

वो ‘गिरने की हद’ भी शर्मसार हो गई,

जब उसने देखा-

इन्सान को हवस की ऊँचाई पर चढ़़ते हुए,

और उसके ईमान को गहराई में गिरते हुए!

जीवनसाथी

आसमां के शून्य में, रंग भरोगे मेरे साथ?

धरती के मण्डल पे, जीवन लिखोगे मेरे साथ?

वायु कि अभिन्नता सा, प्रतीक बनोगे मेरे साथ?

अग्नि के ताप सा, मेरे मान के रक्षक बन, रहोगे मेरे साथ?

जल की शीतलता और पारदर्शता का सार ले, अविरल लय से बहोगे मेरे साथ?

हर दुखः में भी मेरे स्वामि से पहले मेरे मित्र बनकर आगे बढ़ोगे मेरे साथ?

और इसी तरह सही मायनों में जीवनसाथी बन ज़िन्दगी का स्वाद चखोगे मेरे साथ?


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