प्रियतम

प्रियतम छवि नैनन बसी तो फिर क्या देस-विदेस…

“जल्द तुझे भी ले जाऊंगा” कह प्रियतम गये परदेस।

गया हर दिन नयी आस में पर मिला न कोई सन्देस,

सोच यही सब सावन बीते कि-

प्रियतम छवि नैनन बसी तो फिर क्या देस-विदेस!
तभी शोक का उमड़ा सागर सा, मन हो विचिलत यूँ हाय!

नहीं लौटे प्रियतम मेरे, अपने भी हुए पराए!

छोड़ गये अब साथ हमारा माता-पिता भी परम लोक समाये।

फिर भी ना लौटे प्रियतम मेरे….अंधकार सा हुआ जग मेरा…

मन रह-रह कर बुलाए-प्रियतम कि बस एक झलक हो तो रौशनी भर जाये!
हुए मुग्ध थे प्रिय यूँ मेरे छाई तन-धन की वासना,

हूईं अनसुनी “उनकी रक्षा करना” कीं सब कामना!

ना जाने कैसे भूल गये अपनी प्रिया को जानना?

भूला दिया सारा जग मैने बस बची थी अब एक आसना-

“प्रियतम छवि नैनन बसी तो फिर क्या देस-विदेस”।

 सात बरस तब हुए थे पूरे जब प्रियतम लौटे फिर देस,

अपनी नई पत्नी संग फिर एक बार इस घर में किया प्रवेश।

शोक-विलय कि अश्रुधार सा निकला सब आशाओं का  झूठा वेश…

ना प्रियतम छवि नैनन बसी स्वदेस भी हुआ परदेस!!

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कहे-अनकहे लफ्ज़…

दुख अगर अपना हमको बताना नहीं आता,

तुमको भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता||


मैं भी उसे खोने का हुनर सीख नहीं पायी,

उसको भी मुझे छोड कर जाना नहीं आता|| 

                                      ~Waseem Barelvi.

जिन्दगी

“ज़िन्दगी” बदलने के लिए …

             लड़ना पड़ता है..!
         और आसान करने के लिए
              समझना पड़ता है..!
           वक़्त आपका है,चाहो तो
         सोना बना लो और चाहो तो. 
                सोने में गुज़ार दो..!
        अगर कुछ अलग करना है तो
              भीड़ से हटकर चलो..!
           भीड़ साहस तो देती है पर
             पहचान छीन लेती है…!
       मंज़िल ना मिले तब तक हिम्मत
          मत हारो और ना ही ठहरो…. 
                     क्योंकि
    पहाड़ से निकलने वाली नदियों ने
     आज तक रास्ते में किसी से नहीं पूछा कि…
           “समन्दर कितना दूर है.”

रुख़्सत

वादे निभाने में हम इतने उलझ गये,

पता ही ना चला कब तुम इतने बदल गये।

तुमसे मिलकर खुश रहने के अरमान जितने थे बुने,

तुम्हारी बेवफाई से एक पल में धूल में मिल गये।

किसी और के लिये तुम तो हमें एक पल में भूल गये!

लेकिन हम फिर भी तुम्हें यहाँ खुश देखने का वादा लेकर,

रूह के साथ वहीं-कहीं आसमान की ओर रुख़्सत हो गये…

उसने…

एक शख्स जिसे उसने अपने अस्तित्व से तौला था,

अपना नाम भूलकर उसके नाम से कहलाने का सपना देखा था,

उसी बदशख्स ने उसके जिस्म को इस्तेमाल कर उसकी रूह को टुकड़ों मे तोड़ा था…

उसके सम्मान को लज्जित कर उसे वस्तु कि तरह छोड़ा था…

और दुनिया ने भी सिर्फ उसके प्यार को उसकी चरित्रहीनता की नज़र से देखा था…

लेकिन उसकी रूह के टूटे हर एक टुकड़े से निकलते दंशित प्यार के काले रंग से,

किस तरह उसने उन रूह की दरारों को काले अंधेरे में छिपाया था, ये सिर्फ रब ने देखा था।।

बारिश

क्या गज़ब है ये बारिश भी, जब भी आती है,

एक पल में आदमी-आदमी का नज़रिया बता देती है।

कोई इसे कीचड-मिट्टी का मौसम समझ घर में दुबकता है।

तो कोई इसके पानी को  आब-ए-जन्नत समझ पुराने  ज़ख्मों को धोता है।।