अंधा प्यार

किसी ने सही कहा है की प्यार अंधा होता है…

नज़र ही नहीं आया कब…

                        विश्वास धोखे में…

                         प्यार नफ़रत में…

और उसके नाम लेकर ज़िंदगी जीने से…

                              ज़हर खाने में बदल गया।।

Relation

The foundation of our house(relation) we kept, was ‘love‘…

But was slowly made hollow by your betrayal!

But still you want to live in the same building of ‘glass‘…

Just because it ‘shines‘!!

Where

House was a relation.

And became a building– just a tag of relation.

रिश्ता

जिस घर की नींव हमने ‘प्यार‘ रखी थी…

उसे तुम्हारे ‘धोखे‘ के दीमक ने खोखला कर दिया!

और तुम अब भी उस पर बने ‘शीशे‘ के मकान में…

सिर्फ उसकी “चमक” के लिये रहना चाहते हो!!

जहां:-

घर- रिश्ता था   और…

मकान- नाम का रिश्ता बन गया।