जीवनसाथी

आसमां के शून्य में, रंग भरोगे मेरे साथ?

धरती के मण्डल पे, जीवन लिखोगे मेरे साथ?

वायु कि अभिन्नता सा, प्रतीक बनोगे मेरे साथ?

अग्नि के ताप सा, मेरे मान के रक्षक बन, रहोगे मेरे साथ?

जल की शीतलता और पारदर्शता का सार ले, अविरल लय से बहोगे मेरे साथ?

हर दुखः में भी मेरे स्वामि से पहले मेरे मित्र बनकर आगे बढ़ोगे मेरे साथ?

और इसी तरह सही मायनों में जीवनसाथी बन ज़िन्दगी का स्वाद चखोगे मेरे साथ?


फिर से…

चलो फिर से आज जन्नत में जहन्नुम का नज़ारा दिखाते हैं…

चलो फिर से आज प्यार में धोखे का फसाना सुनाते हैं…

वैसे तो लोग उस दर्द भरे किस्से के लफ्ज़ आज भी फिज़ाओं में बहाते हैं…

लेकिन चलिये जाने दीजिये कौन सा हम आपको एक पल में आँसुओं के सैलाब और दुखों के पहाड़ तले दबाना चाहते हैं!!

क्यूँ

कहते हैं जो कुछ होता है उसके पीछे कोई न कोई वजह होती है, 

मगर  सच यह है कि उस वजह के पीछे छिपे हर क्यूँ का जवाब नहीं होता….

जब एक लड़की के साथ जुर्म होता है

तब वजह गिनाने वाले कुछ इस तरह कहते हैं-

“बड़े बाप की बिगड़ी औलाद”

“कपड़े इतने छोटे होंगे तो यही होगा ना”

“इतनी रात को क्या सड़क नापने गई थी बाहर?”

अगर आप इतने बड़े ञानी हैं तो जुर्म करने वाले का भी पथप्रदर्शशन क्यूँ नहीं किया? या फिर कुछ तो टिप्पड़ी करने को ही जीवन का सुख समझते हैं तो याद रखें की आपके साथी कल भी वही होंगे मगर पीड़ित कोई आपका अपना भी हो सकता है! 

याद रखिये कि आपका काम तो टिप्पड़ी कर खत्म हो गया लेकिन उस लड़की का जीवन रही सोचने में निकल जाता है कि क्यूँ आखिर क्यूँ!

खड़े होकर तमाशा देखने वाले बहुत होते हैं। 

कल को जब खुद पे बीते तो ये सोचने में समय व्यर्थ ना करे की कोई मदद करने आगे नहीं आया आखिर क्यूँ!

लड़की को आज भी शाम के सात बजे के बाद बाहर रहने पर रोक लगाना तो ये ना सोचना कि बिटिया कुछ बन क्यूँ नहीं पाई! 

आज-कल छोटी-छोटी बातों पे लोग खासकर (किशोर वर्ग) एक दूसरे कि माताओं-बहनों के लिये अपशब्द बोलते हैं। तो ये भी याद रखें कि आपका आवेश और अगले कि मान हानि कि भरपाई आपके ही कहे अपशब्द आपके अपने के लिये सत्य बनकर बदला न ले लें।

तब ऐसा कहा हि क्यूँ का जवाब नहीं मिलेगा!

और जो लोग कपड़ों को लेकर बड़े जागरूक हैं वो ये भी जानें कि केवल कपड़ों का कुसूर नहीं क्यूँकी हाल ही में शर्म से परे, जुर्म एक छह महीने की बच्ची के साथ हुआ था।
कपड़े कैसे भी हों तन पर सज के उसे परदा करते हैं मगर आपकी नज़र तो आपके चिरित्र का आईना है साहब! कृपया अपना आईना साफ रखियेगा।

# ऊपर लिखे शब्द भावनाओं से जुड़े बेहद संवेदनशील मुद्दों को उठाते हैं किसी भूल-चूक के लिये छमा। समाज के इस नये उभरते चहरे पर कुछ विचार।






लेखक

जादु के लिये जादुगर हाथों का इस्तेमाल किया करते हैं!

दंव्धों के लिये राजा-सेना तलवारों का इस्तेमाल किया करते हैं!

लेकिन हम लेखक तो शब्दों से ही बेमिसाल कमाल किया करते है!!

लम्हा

लम्हा वो नहीं जब तुम हमारे पास आए थे।

लम्हा वो नहीं जब तुमने हम पर पूरी तरह ग़ौर फरमाए थे।

लम्हा वो भी नहीं जब तुमने हमारी तारीफ़ों के गज़ल गाये थे।

लम्हा तो सिर्फ वो था जब आज तुम दिल से मुस्कुराये थे।।

वादा

आज की इस तारीख की ख़ासियत का तुझे इल्म भी है?

 आज पूरे हुए उसी पुराने वादे का मन में ज़रा ज़िक्र भी है?

 जिसको सर आँखों पे रख हम हर रोज़ तनहाई को आब की तरह पी गये,

ये बता जान-ए-जिगर मेरे उस प्यार के लिये तेरे दिल में इज्जत की ज़रा सी किश्त भी है?

Sacrifice

Today again the flame of your memories is burning ablaze in my heart…

Today again uncountable times my girdle has gone wet by these unending tears…

But still like these several years even today on our anniversary i have fulfilled my duty.

Today again just like a wife i have made this world believe in restraints rather than your betrayal!

(Translated from Hindi Post “त्याग”)