She…

-Nandita.

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You…

Your gentle presence:-

A herald of eminence and laughter…


Your amorous talks:-

A fresh wave for the sussurate of my shimmery-shining leaves of love…


The ‘lock’ of you arms:-

A swift key to the transparent world of peace; An estrangement from the world of ‘hiding-masks’.


The mirror of your vision:-

Lustrates and reflects the monotonus light, enlightening  my present…


That’s YOU-who deserves the best of me…and the same you shall always be,                                                                              To be with me as long as i live in this mortal ‘Me’,

And after the life, when i leave to harmonize as a part of infinity…

Tree

This painting inspired and instilled me with some words. The importance of little but of great value, if we connect with nature then peace accompanied certainly. This painting just did not pop up as is it is but painted magnificently with the ink pouring from the heart of Miss Nandita Gupta from the poetic periscope. […]

via Tree — !ns¡ght

Thank you Aquib ji for that great collaboration!😊😊

प्रियतम

प्रियतम छवि नैनन बसी तो फिर क्या देस-विदेस…

“जल्द तुझे भी ले जाऊंगा” कह प्रियतम गये परदेस।

गया हर दिन नयी आस में पर मिला न कोई सन्देस,

सोच यही सब सावन बीते कि-

प्रियतम छवि नैनन बसी तो फिर क्या देस-विदेस!
तभी शोक का उमड़ा सागर सा, मन हो विचिलत यूँ हाय!

नहीं लौटे प्रियतम मेरे, अपने भी हुए पराए!

छोड़ गये अब साथ हमारा माता-पिता भी परम लोक समाये।

फिर भी ना लौटे प्रियतम मेरे….अंधकार सा हुआ जग मेरा…

मन रह-रह कर बुलाए-प्रियतम कि बस एक झलक हो तो रौशनी भर जाये!
हुए मुग्ध थे प्रिय यूँ मेरे छाई तन-धन की वासना,

हूईं अनसुनी “उनकी रक्षा करना” कीं सब कामना!

ना जाने कैसे भूल गये अपनी प्रिया को जानना?

भूला दिया सारा जग मैने बस बची थी अब एक आसना-

“प्रियतम छवि नैनन बसी तो फिर क्या देस-विदेस”।

 सात बरस तब हुए थे पूरे जब प्रियतम लौटे फिर देस,

अपनी नई पत्नी संग फिर एक बार इस घर में किया प्रवेश।

शोक-विलय कि अश्रुधार सा निकला सब आशाओं का  झूठा वेश…

ना प्रियतम छवि नैनन बसी स्वदेस भी हुआ परदेस!!